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Showing posts from April, 2019

मज़दूर दिवस

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बदलाव कैसे आयेगा

राकेश, राजस्थान समाज में क्रांति कैसे आयेगी, यह समाज का या हम सबका सबसे अहम मुद्वा है जो आसान नहीं है लेकिन असम्भव भी नहीं  है। समाज में क्रांति का कारण एक नहीं हो सकता है लेकिन हमें एक संगठन के माध्यम से एकजुट होकर क्रांति की राह पर कदम बढ़ाने चाहियें और उसे संभव बनाने का प्रयास करना चाहिए। हम लोगों को अपने प्रति सचेत होना चाहिए और अपने खिलाफ होने वाले शोषण के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे संगठनों से अधिक से अधिक लोग जुड़ें और अपने कर्तव्य व अधिकारों को समझंे एवॅं उनको पाने के लिए हर संभव प्रयास करें।  भाइयों और बहनों आप यह सवाल अपने से ही पूछो और निर्णय लो कि क्या आपको समाज में होने वाली गड़बड़ी सही लगती हैं ? अगर नहीं सही लगती हैं तो एकजुट हो और इन गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाओ और संघर्ष करो।

नई क्रांति

केसर सिंह  आधारशिला शिक्षण केन्द्र, मध्य प्रदेश सृष्टि के क्रमिक विकास यानि बदलाव से ही आज हम इंसान  यहाँ    इक्ठठे होकर एक दूसरे से मिल पा रहे  हैं  । संसार के अलग-अलग कालों में लोगो ने अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और  क्रांति  की राह पर चले जिसमें उन्होंने सफलता भी प्राप्त की। वर्तमान स्थिति में किसानों, मजदूरों, महिलाओं को अनेक  दुखों का सामना करना पड़ रहा है।  वे  लगातार समाज के पूंजीपति वर्ग  द्वारा शोषित होते जा रहें है। समाज के सभी शोषित वर्गो को एकजुट होते हुये पुनः नवीन क्राति की शुरूआत करनी चाहिए। भारत की करीब सत्तर प्रतिशत जनता गांव में निवास करती है। इतनी बड़ी संख्या है फिर भी 9 प्रतिशत डमरूधारी डमरू की आवाज पर सबको नचा रहे हैं। हमारे द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि पूंजीपतियों के साथ मिलकर हमारा शोषण करते हैं। आज मैं सभी कार्यकर्ताओं से आहवान् करता हूं। ग्राम स्वराज्य की स्थापना के लिए आपसी झगड़ों व अन्य समस्याओं के निदान हेतु ग्राम सभा को अपनायें। समाज में जो चल रहा है वह सही है या गलत, इसे समझने के लिये  वि...

भारत में मजदूरों की स्थिति

साथियों आज हमारे देश में मजदूरों की स्थिति बहुत ही खराब होती जा रही है। समाज में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को स्ंवय से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या वह मजदूरों की इस स्थिति से वाकिफ नही है या जानबूझ कर अन्जान बना हुआ है?  क्यांेकि आज भी हममें से कुछ लोग सोचते हैं कि यदि मज़दूरों को उनका हक मिला तो इससे हमारा नुकसान होगा। इसी सोच के चलते समाज का एक तबका इनके हकों की बात नहीं करता हैं। जो करते भी हैं उन्हें ज़ोर ज़बरदस्ती चुप करवा दिया जाता है। पर शायद हम ये नहीं सोचते कि उनको हक मिल जाये तो उनको हज़ारों समस्याओं से निजात मिल जाये। उनके घर और परिवार और बच्चों के चेहरो पर एक अलग सी खुशी देखने को मिलेगी। हम भूल जाते हैं कि वे भी हमारे भाई बहन हमारे अपने ही लोग हैं जो दूसरों को खुशी देकर खुद अपना जीवन दुःख भरा बिताते हंै। मज़दूर चाहे महिला हो या पुरूष, उनका शोषण किया जा रहा है। आर्थिक रूप से, मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से उनका शोषण किया जा रहा है। पर शायद हम भूल जाते हैं कि आज हमारे इन्हीं मजदूर भाई बहनों की वजह से हमारे देश की आर्थिक स्थिति मज़बूत हो रही है। फिर भी आज हमारे देश में हमार...

आज की व्यवस्था में मीडिया की भूमिका

देवीलाल भलावी  छिंदवाड़ा-मध्य प्रदेश भाइयों और बहनों मीडिया क्या है इसके बारे में आप सभी लोग अच्छी तरह से परिचित है। मीडिया एक ऐसा जरिया है जिसके माध्यम से हम लोग समाज और देश-दुनिया में होने वाली गतिविधियों के बारे में जान सकते है। लेकिन वर्तमान में यह मीडिया सिर्फ कुछ लोगो के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है। जिसके अन्तर्गत मीडिया सिर्फ पूंजीपतियों, कम्पनियों, फैक्टरियों आदि का ही प्रचार आम जनता तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। यह पूंजीवादी व्यवस्था सिर्फ अपने मुनाफे का सोचती है आम जनता से इसे कोई लेना देना नही है। आजकल मीडिया का काम सिर्फ यह रह गया है कि किस तरह से पूजीपतियों के उत्पादो को आम जनता को बेचा जाये। मीडिया जातिवाद को भी बढ़ावा दे रही है और सर्वण लोगो की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्रकार की सामाजिक घटनाए और दुर्घटनाए हो रही है पर उन खबरों को मीडिया द्वारा जगह नही दी जा रही है। इसका सार यही निकलता है कि मीडिया नही चाहती कि अलग-अलग क्षेत्रों में क्या हो रहा है इसकी जानकारी आम लोगो तक पहुंच पाये। मीडिया को लगता है कि यदि यह आम ना...

आज महिलाओं का स्थान

साथियों जैसा कि आप सभी जानते है कि आज भी महिलाओं को हीन भावना से देखा जाता है इसका कारण क्या है आप सभी भलि भांति जानते है। आज समाज का कोई भी वर्ग चाहे वह दलित, आदिवासी या मुस्लिम समुदायों में महिला व पुरूष दोनो ही परिवार को चलाने के लिए मिल कर काम कर रहे है। फिर भी महिलाओं को दोयम दर्जे के तहत देखा जाता है। महिलाएॅं न सिर्फ घर के बाहर जाकर काम करती हैं बल्कि घर में भी अपनी अहम् भूमिका निभाती हंै जिसके तहत वह बच्चों परिवार के बुजर्गो और घर के कामों को भी बखूबी निभा रही है। बावजूद इसके समाज में इन्हें दोयम दर्जा मिला हुआ है इनके काम को स्वीकार नही किया जाता है। घर के पुरूषों और अन्य सदस्यों द्वारा इनके काम को कोई अहमियत नही दी जाती है। इनके काम पर लगातार सवाल उठाये जाते है कि तुम सारा दिन घर में रहकर करती ही क्या हो? हमें इस तरह की सोच को बदलना चाहिए और समाज मे महिलाओं के योगदान को स्वीकारते हुए उन्हें सम्मान देना चाहिए।

शादी विवाह पर आर्थिक स्थिति

- नरेन्द्र लोहा साथियों जिन्दाबाद शादी विवाह आज के समय में प्रतिस्पर्धा का बाजार बन चुका है, और इससे बहुत सारे बेकार के खर्च और समय की बर्बादी देखने को मिल रही है जिससे छोटे और निचले वर्ग के लोग कर्ज में डूब रहे है। धीरे-धीरे यह प्रचलन अभी सभी जगह बढता जा रहा है। लोग कर्जे के दबाव में आकर आत्म हत्या तक कर रहे है पर किसी के मन में यह बात नही आ रही है कि दहेज लेना और दहेज देना भी शादी में होने वाले खर्च को बड़ा रहा है। साथ ही साथ आधुनिक सजावट करना घर छोड कर बाहर शादी करना जिसमें आजकल होटल, बैकेट हाल बुक करवाये जाते है जिसमें अधिक खर्च आता है। साथियों यह बात हम सब को समझना है कि शादी विवाह दो परिवारों का मिलन है, प्रेम है तो हमें दिखावा प्रवृति को त्यागते हुये आपस में प्रेम से शादी विवाह का कार्य सम्पन्न करना चाहिए। जिससे हमारा बहुत सारा पैसा खर्चा होने से बच सकता है एंव हम लोगों की आर्थिक स्थिति और ज्यादा खराब न हो हमें इसका प्रयास करना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ताओं को ऐसे समारोह का बहिश्कार करना चाहिये।                       ...

मेरा कूड़ेदान

- जोहेब आजाद मेरे कूड़दान में                                                                           कुछ कागज के पन्ने उन में बसे लफ्ज मेरे तकलीख़ मेरी कुछ दर्द और मेरे सपने अधुरे

युवा मन की आवाज़

अमित  इनसान सदा ही सोचने वाला प्राणी रहे हैं। लेकिन आजकल, सोशल मीडिया के माध्यम से यह कोशिश की जा रही है कि हम सब सोचना बंद कर दें। सोचना बंद करके सोशल मीडिया पर प्रसारित भड़काउ संदेशों पर चिल्लाते रहें। काफ़ी हद तक यह कोशिश सफ़ल भी हो रही है। शिक्षा का हाल भी ऐसा है जिसमें केवल प्रश्न उत्तर याद करके विद्यार्थी पास हो रहे हैं। स्कूल काॅलेज में भी सोचने का कुछ अभ्यास नहीं हो रहा। इसके साथ ही पढ़ने की आदत भी ख़त्म हो गई है। बहुत से बच्चों या बड़ों नें पत्रिका देखी ही नहीं हैं। ऐसी स्थिती में भी हमारा अनुभव है कि यदि बच्चों को, युवाओं को सोचने का मौका दिया जाये तो वे बहुत कुछ सोचते हैं। और केवल अपनी ज़िन्दगी या अपनी समस्याओं के बारे में ही नहीं वे देश दुनिया के बारे में, विचारधाराओं के बारे में इतिहास के बारे में, हर विषय पर गम्भीरता से सोचते हैं। युवानिया पत्रिका के माध्यम से हम युवाओं को अपनी सोच को कलमबद्ध करने का मौका दे रहे हैं। इस पत्रिका के माध्यम से मुख्यतः हम युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस पास के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिदृष्य पर उनके विचारों को भ...

आज आवश्यकता है

छोटूसिंह रावत  महिला जन अधिकार समिति अजमेंर राजस्थान आज आवश्यकता है झूठी अफ़वाहो, भड़काउ संदेशों से दूर रहने की... आज आवश्यकता है दंगा भड़काने, नफ़रत -हिंसा फैलाने, लूटपाट करने वालों का मिलकर सामना करने की.... आवश्यकता है परिवार व समाज में शान्ति तथा विश्वास करने वालों को इकठ्ठा होने की। आज आवश्यकता है मन्दिर-मस्जिद, धर्म के नाम पर  चुनावी राजनीति को बेनकाब करने की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा के लिये और भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की.... आज आवश्यकता है जल जंगल जमीन, जो हम सबके हैं, जिन्हे हम प्यार करते हैं, इन्हे बचाने की... आवश्यकता है मानव धर्म की, प्रेम, त्याग और सामाजिक सद्भावना की.... आईये हम सब मिल-जुल कर अपने घर, परिवार, मौहल्ले समाज में समता और बराबरी की अलख जगाते हैं।

किसानी का संकट

पंकज सेनानी, मध्य प्रदेश आज हमाारे देश में किसानों पर बड़ा सकंट छाया है। हम देख रहें है कि हमारे देश में किसान आत्महत्या की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान में यह संख्या तीन लाख के करीब पहंुच चुकी है। मेरा मानना है कि किसानों ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि इनकी अप्रत्यक्ष हत्या की जा रही है। भारत में हज़ारों वर्षो से हो रहे, किसानों के शोषण व लूट की वजह से आज किसान ऐसी स्थिति में आ गये हैं कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हंै। किसानो की समस्याएं सिर्फ यहीं नहीं खत्म होतीं। एक तरफ पूंजीपतियों के शोषण को झेल रहे हंै और दूसरी तरफ प्रकृति की मार झेल रहे हैं। जिसमें कि भूमि बंजर होना, जल स्तर घटना, बारिश का नियमित न होना इत्यादि। इन सभी कारणों के लिए किसान कहीं से भी जिम्मेदार नही है बल्कि वो लोग हैं जो अपने मुनाफ़े के लिये प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। बड़े-बड़े कारखाने, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, बड़े-बड़े बाॅंध बनाकर प्रकृति को नष्ट किया जा रहा है जिसके कारण प्रकृति अपना भयानक रूप दिखा रही है। इन सबका दुष्परिणाम किसान को झेलना पड़ रहा है। इन सारी बातों को छोड़कर हमारी सरकारें मन की बात सु...