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युवा मन की आवाज़
अमित
इनसान सदा ही सोचने वाला प्राणी रहे हैं। लेकिन आजकल, सोशल मीडिया के माध्यम से यह कोशिश की जा रही है कि हम सब सोचना बंद कर दें। सोचना बंद करके सोशल मीडिया पर प्रसारित भड़काउ संदेशों पर चिल्लाते रहें। काफ़ी हद तक यह कोशिश सफ़ल भी हो रही है। शिक्षा का हाल भी ऐसा है जिसमें केवल प्रश्न उत्तर याद करके विद्यार्थी पास हो रहे हैं। स्कूल काॅलेज में भी सोचने का कुछ अभ्यास नहीं हो रहा।
इसके साथ ही पढ़ने की आदत भी ख़त्म हो गई है। बहुत से बच्चों या बड़ों नें पत्रिका देखी ही नहीं हैं।
ऐसी स्थिती में भी हमारा अनुभव है कि यदि बच्चों को, युवाओं को सोचने का मौका दिया जाये तो वे बहुत कुछ सोचते हैं। और केवल अपनी ज़िन्दगी या अपनी समस्याओं के बारे में ही नहीं वे देश दुनिया के बारे में, विचारधाराओं के बारे में इतिहास के बारे में, हर विषय पर गम्भीरता से सोचते हैं।
युवानिया पत्रिका के माध्यम से हम युवाओं को अपनी सोच को कलमबद्ध करने का मौका दे रहे हैं। इस पत्रिका के माध्यम से मुख्यतः हम युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस पास के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिदृष्य पर उनके विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
हमारा यह मानना है कि गरीब वर्ग को अपने हालातों के बारे में और इन हालातों को बदलने के तरीकों के बारे में सोचना बहुत ज़रूरी है। समाज बदलने का संघर्ष केवल सड़कों पर नहीं लड़़ा जा सकता। यह एक विचारों की लड़ाई भी है।
आपकी अभिव्यक्ति किसी भी माध्यम में हो सकती है - लेख, चित्र, कहानी, कविता, शायरी आदि।
आप यह बिलकुल न सोचें कि आपको लिखना नहीं आता, या आपका विचार सही है या गलत है क्योंकि यह आपकी ही पत्रिका है।
अमित
इनसान सदा ही सोचने वाला प्राणी रहे हैं। लेकिन आजकल, सोशल मीडिया के माध्यम से यह कोशिश की जा रही है कि हम सब सोचना बंद कर दें। सोचना बंद करके सोशल मीडिया पर प्रसारित भड़काउ संदेशों पर चिल्लाते रहें। काफ़ी हद तक यह कोशिश सफ़ल भी हो रही है। शिक्षा का हाल भी ऐसा है जिसमें केवल प्रश्न उत्तर याद करके विद्यार्थी पास हो रहे हैं। स्कूल काॅलेज में भी सोचने का कुछ अभ्यास नहीं हो रहा।
इसके साथ ही पढ़ने की आदत भी ख़त्म हो गई है। बहुत से बच्चों या बड़ों नें पत्रिका देखी ही नहीं हैं।
ऐसी स्थिती में भी हमारा अनुभव है कि यदि बच्चों को, युवाओं को सोचने का मौका दिया जाये तो वे बहुत कुछ सोचते हैं। और केवल अपनी ज़िन्दगी या अपनी समस्याओं के बारे में ही नहीं वे देश दुनिया के बारे में, विचारधाराओं के बारे में इतिहास के बारे में, हर विषय पर गम्भीरता से सोचते हैं।
युवानिया पत्रिका के माध्यम से हम युवाओं को अपनी सोच को कलमबद्ध करने का मौका दे रहे हैं। इस पत्रिका के माध्यम से मुख्यतः हम युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस पास के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिदृष्य पर उनके विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
हमारा यह मानना है कि गरीब वर्ग को अपने हालातों के बारे में और इन हालातों को बदलने के तरीकों के बारे में सोचना बहुत ज़रूरी है। समाज बदलने का संघर्ष केवल सड़कों पर नहीं लड़़ा जा सकता। यह एक विचारों की लड़ाई भी है।
आपकी अभिव्यक्ति किसी भी माध्यम में हो सकती है - लेख, चित्र, कहानी, कविता, शायरी आदि।
आप यह बिलकुल न सोचें कि आपको लिखना नहीं आता, या आपका विचार सही है या गलत है क्योंकि यह आपकी ही पत्रिका है।
आशा है आपको यह प्रयास अच्छा लगेगा और आप इसे सफ़ल बनायेंगे।
बिल्कुल अमित भाई
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