किसानी का संकट

पंकज सेनानी, मध्य प्रदेश

आज हमाारे देश में किसानों पर बड़ा सकंट छाया है। हम देख रहें है कि हमारे देश में किसान आत्महत्या की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान में यह संख्या तीन लाख के करीब पहंुच चुकी है। मेरा मानना है कि किसानों ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि इनकी अप्रत्यक्ष हत्या की जा रही है। भारत में हज़ारों वर्षो से हो रहे, किसानों के शोषण व लूट की वजह से आज किसान ऐसी स्थिति में आ गये हैं कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हंै।

किसानो की समस्याएं सिर्फ यहीं नहीं खत्म होतीं। एक तरफ पूंजीपतियों के शोषण को झेल रहे हंै और दूसरी तरफ प्रकृति की मार झेल रहे हैं। जिसमें कि भूमि बंजर होना, जल स्तर घटना, बारिश का नियमित न होना इत्यादि। इन सभी कारणों के लिए किसान कहीं से भी जिम्मेदार नही है बल्कि वो लोग हैं जो अपने मुनाफ़े के लिये प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। बड़े-बड़े कारखाने, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, बड़े-बड़े बाॅंध बनाकर प्रकृति को नष्ट किया जा रहा है जिसके कारण प्रकृति अपना भयानक रूप दिखा रही है। इन सबका दुष्परिणाम किसान को झेलना पड़ रहा है।

इन सारी बातों को छोड़कर हमारी सरकारें मन की बात सुनाने में लगी है और वास्तविकता से हमें भटकाने में लगी है।

अभी-अभी कुछ दिन पहलें भारत सरकार द्वारा बजट पेश किया गया जिसमें हमारी सरकार ने ऐलान किया कि वह किसानोें को प्रतिवर्ष 6 हजार दिया जायेगा। ऐसी सरकारों को क्या कहा जाना चाहिए जहां पर वह 6000 प्रति माह मिलने की घोषणा के साथ ही किसानों के मुद्वों पर विराम लगा देती है और कहती है कि समय बहुत कम है। सरकार द्वारा दिया गया यह कथन विचारणीय है जहां पर जिस देश में जय जवान जय किसान का नारा लगता है उस देश में किसानों के मुद्वे पर बात करने का समय नही है।

मै एक नारे के साथ अपनी बात को समाप्त करना चाहूंगा
                                  - किसानों का बुरा हाल है     
                                     ये सरकारें फेल हैं।

                                  - दलालों के दल हैं ये

                                     पूॅंजीवादी सरकारें फे़ल हैं

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